पुस्तक का परिचय
हर विचारधारा ने कोशिश की है। अलग-अलग युगों में, हर तरीके से, हर महाद्वीप पर। कभी कुछ ठीक नहीं हुआ। हर समस्या उसे हल करने के लिए और व्यवस्था पैदा करती है। ज़्यादा व्यवस्था ज़्यादा समस्या पैदा करती है। समाधान और बोझ बन जाता है। नीतियाँ बँटवारे के तरीके हैं और बाँटने के लिए हर बार कम बचता है। अगर जवाब राजनीतिक होता, तो दो सौ साल के तमाम प्रस्तावों से कब का हल हो गया होता। एक मुख्य शहतीर है। किसी भी सरकार से पुरानी। जब दिखेगी, तो अनदेखा नहीं कर पाओगे।
इस पुस्तक के विषय
व्यवस्था की सीमाओं, संसाधनों के वितरण और विचारधाराएँ बदलने पर भी बने रहने वाले संकटों पर एक निबंध।
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